*घास के लिए जंगलो में आग लगाने की कुप्रथा आज भी जारी है*
पुष्कर पर्वत न्यूज/राजेन्द्र असवाल :
चमोली-उत्तराखंड:
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के निवासियो के लिए इससे बड़कर दुर्भाग्यपूर्ण खबर और क्या हो सकती है। उन्होंने घास की अच्छी पैदावार के लालच में खेतो में आड़ा फूंकना तथा वनो में आग लगाने की कुप्रथा की विगत कई सालो से ऐसी नींव डाल दी है। जो आज भी कायम है। हमारे देश में आर्यो के आगमन के साथ वनो को जलाना उन्हें साफ करने का प्रचलन प्रारंभ हुआ था। क्योंकि आर्य लोग पशुपालक थे।और कृर्षि कार्य करते थे। कृर्षि के लिए भूमि तैयार करने के लिए जंगलो का काटना उन्हें जलाना। फिर उस पर खेती करना था। आर्यो को इसी दौरान एक अनुभव भी हुआ, जब-जब खेती के लिए जंगल काटे और उन्हें फूंकने के बाद तुरंत बारिश आ जाती थी। उन लोगो को जब भी बारिश की आवश्यकता होती थी वे जंगलो को काटते और जला देते तो फौरन बारिश आ जाती थी।
जंगल से जल और जल से जीवन जैसे गौड़ रहस्य को नजरअंदाज कर केवल घास की अच्छी पैदावार के लालच में पहाड़ो की वन संपदा को आग के हवाले कर जहां कई हैक्टर क्षेत्र की लाखो रुपए की वन संपदा को प्रति वर्ष आग के हवाले करते है वही निरीह वन्य प्राणियो की भी सामंत आती है, जो कि पर्यावरण की स्थिति को असंतुलित कर जीव विविधता के लिए संकट पैदा कर देता है। इसबार मार्च में वनाग्नि की घटनाओ को रोकने लिए वन महकमें ने मार्च माह में बड़ी गोष्ठियाँ कर , जंगलो में आगजनी को रोकने के लिए कई तरीके अपनाते हुए वन कर्मियो द्वारा जंगलो में लाइन काटी । ताकि आग लग जाए तो इन लाइनो पर आग पर काबू पाया जा सके। सेमिनार और बेबीनारो में बड़े-बड़े वन एवं पर्यावरणविद् आग से वन व पर्यावरण संरक्षण की बात करते सुने जाते है, लेकिन जब जंगल आग से धधकते रहते है, और सारा वातावरण धुंआ-धुंआ हो जाता है, तब बड़ी -बड़ी बाते करने वाले पर्यावरण प्रेमी एक भी आवाज नही लिकाल पाते,आखिर इसके पीछे क्या वजह है। आग को बढ़ावा देने में खेतो में आड़ा(खरपतवार) फूंकने की परंपरा आज भी जारी है,खासबात यह है कि खेतो में आड़ा दिनभर सूखने के बाद अधिकांशत: शाम को ही जलाये जाते है । जो कि आग खंतो के किनारे से जंगल में रात्रि को पहुँचती है। और जब आग चीड़ के जंगल में पहुंचती है और पिरुल व चीड़ के पेड़ो के छौते जो कि आग लगने पर गिरने के बाद दू-दूर तक जाकर जंगल को आग के हवाले कर देते है। बहरहाल जंगल में लगी आग को बुझाते समय वन कर्मियो व ग्रामीणो आग कीप लपटो,पत्थरो,व चीड़ के पेड़ो से जलती टहनियों के गिरने से जान जोखिम मे पड़ने का खतरा बना रहता है। जरूरत है, जंगलो मे आग से बचाने की कोई ठोस नीति बनाने की।

